मैं वो बात हूं ,आज तक अनकही हूँ।।
अंधेरे में अक्सर अंधेरे को छू कर
अंधेरे की अंधी कसम खा रही हूं।
मेरे पास है माल ज़र और जवानी।
मै नीयत हूं कब साफ सुथरी रही हूं।
मैं धारा हूँ सूखी किसी बे जुबां की
किसी की कलम से मैं अक्सर बही हूँ।
हुआ नाम दीप इक ने रौशन किया सब
मैं बाती हूँ जो रौशनी को जली हूं
दीप ज़ीरवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें